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Aalha Khand Pdf Free / आल्हा खंड फ्री डाउनलोड pdf

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नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Aalha Khand Pdf देने जा रहे हैं, आप नीचे की लिंक से Aalha Khand Pdf download कर सकते हैं और आप यहां से Andha Yug Pdf in Hindi कर सकते हैं।

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Aalha Khand Pdf Download

 

 

पुस्तक का नाम  Aalha Khand Pdf
पुस्तक के लेखक  ललित प्रसाद मिश्रा 
भाषा  हिंदी 
फॉर्मेट  Pdf 
साइज  26.5 Mb 
पृष्ठ  618 
श्रेणी  काव्य 

 

 

 

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आल्हा खंड Pdf

 

 

 

आल्ह खंड की रचना 1140 ई. मानी जाती है। इसके रचनाकार जगनिक भाट है जो चंदेल नरेश परिमार्दि परमाल के द्वारा संरक्षित थे।आल्ह खंड में 23 खंड और 52 युद्धों का वर्णन प्राप्त होता है। जगनिक का मूल नाम जगत सिंह है। उन्होने आल्ह खंड तथा परमाल रासो नामक मौखिक काव्य की रचना किया था।

 

 

इनके द्वारा रचित काव्य जन मानस के भीतर तक अपनी पैठ बनाने में सफल हुआ और जनमान काव्य बन गया। आल्हा का पाठ करने वालो को अल्हैत कहा जाता है। आल्ह खंड पूरे बुन्देल खंड अपनी चरम लोकप्रियता प्राप्त कर चुकी है।

 

 

आल्ह खंड का पाठ गांव की चौपालों पर प्रायः सावन के महीने जब रिमझिम बरसात होती रहती है तभी अपनी ख्याति के अनुरूप प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। राम चरित मानस के पश्चात कोई काव्य जन मानस के इतने करीब होने का सौभाग्य अगर किसी काव्य को प्राप्त है तो वह आल्ह खंड है।

 

 

 

सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

यह सुनकर भगवान वृषभध्वज शंभु हंसने लगे और विशेषतः दुष्ट योगियों को लोकाचार का दर्शन कराते हुए वे हिमालय से बोले – शैलराज! यह कुमारी सुंदर कटिप्रदेश से सुशोभित, तन्वंगी, चंद्रमुखी और शुभ लक्षणों से सम्पन्न है। इसलिए इसे मेरे समीप तुम्हे नहीं लाना चाहिए।

 

 

 

इसके लिए मैं तुम्हे बारंबार रोकता हूँ। वेद के पारंगत विद्वानों ने नारी को मायारूपिणी कहा है। विशेषतः युवती स्त्री तो तपस्वीजनों के तप में विघ्न डालने वाली ही होती है। गिरिश्रेष्ठ! मैं तपस्वी, योगी और सदा माया से निर्लिप्त रहने वाला हूँ। मुझे युवती स्त्री से क्या प्रयोजन है।

 

 

 

तपस्वियों के श्रेष्ठ आश्रय हिमालय! इसलिए फिर तुम्हे ऐसी बात नहीं कहनी चाहिए क्योंकि तुम वेदोक्त धर्म में प्रवीण, ज्ञानियों में श्रेष्ठ और विद्वान हो। अचलराज! स्त्री के संग से मन में शीघ्र ही विषयवासना उत्पन्न हो जाती है। उससे वैराग्य नष्ट होता है और वैराग्य न होने से पुरुष उत्तम तपस्या से भ्रष्ट हो जाता है।

 

 

 

इसलिए शैल! तपस्वी को स्त्रियों का संग नहीं करना चाहिए क्योंकि स्त्री महाविषय वासना की जड़ एवं ज्ञान वैराग्य का विनाश करने वाली होती है। ब्रह्मा जी कहते है – नारद! इस तरह की बहुत सी बाते कहकर महयोगिशिरोमणि भगवान महेश्वर चुप हो गए।

 

 

 

देवर्षे शंभु का निरामय, निःस्पृह और निष्ठुर वचन सुनकर काली के पिता हिमवान चकित, कुछ-कुछ व्याकुल और चुप हो गए। तपस्वी शिव की कही हुई बात सुनकर और गिरिराज हिमवान को चकित हुआ जानकर भवानी पार्वती उस समय भगवान शिव को प्रणाम करके विशद वचन बोली।

 

 

 

योगिन! आपने तपस्वी होकर गिरिराज से यह क्या बात कह डाली? प्रभो! आप ज्ञान विशारद है तो भी अपनी बात का उत्तर मुझसे सुनिए। शंभो! आप तपः शक्ति से सम्पन्न होकर ही बड़ा भारी तप करते है। उस शक्ति के कारण ही आप महात्मा को तपस्या करने का विचार हुआ है।

 

 

 

सभी कर्मो को करने की जो वह शक्ति है उसे ही प्रकृति जानना चाहिए। प्रकृति से ही सबकी सृष्टि, पालन और संहार होते है। भगवन! आप कौन है? और सूक्ष्म प्रकृति क्या है? इसका विचार कीजिए। प्रकति के बिना लिंगरूपी महेश्वर कैसे हो सकते है?

 

 

 

आप सदा प्राणियों के लिए अर्चनीय, वंदनीय और चिंतनीय है, वह प्रकृति के कारण ही है। इस बात को हृदय से विचारकर ही आपको जो कहना हो, वह सब कहिए। ब्रह्मा जी कहते है – नारद! पार्वती जी के इस वचन को सुनकर महती लीला करने में लगे हुए प्रसन्नचित्त महेश्वर हंसते हुए बोले।

 

 

 

मैं उत्कृष्ट तपस्या द्वारा ही प्रकृति का नाश करता हूँ और तत्वतः प्रकृति रहित शंभु के रूप में स्थित होता हूँ। अतः सत्पुरुषों को भी कभी या कही प्रकृति का संग्रह नहीं करना चाहिए। लोकाचार से दूर एवं निर्विकार रहना चाहिए। नारद! जब शंभु ने लौकिक व्यवहार के अनुसार यह बात कही।

 

 

 

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