7 Habits Of Highly Effective People Hindi Pdf Free Download

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7 Habits Of Highly Effective People Hindi Pdf

 

 

 

 

 

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दिव्य ज्ञान सिर्फ पढ़ने के लिए 

 

 

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दिव्यज्ञान का उपदेश अर्जुन के लिए – इस दिव्यज्ञान को भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को बताते हुए कह रहे है कि मैंने इस अमर योग विद्या का उपदेश सूर्यदेव विवस्वान को दिया और विवस्वान ने मनुष्यो के पिता मनु को दिया और मनु ने इसका उपदेश इक्ष्वाकु को दिया।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – भगवद्गीता अत्यंत ही प्राचीन है, यहां पर उसका इतिहास प्राप्त होता है। जब इसे सूर्य लोक इत्यादि सम्पूर्ण लोको के राजा को प्रदान किया गया था। समस्त लोको के राजा विशेष रूप से निवासियों की रक्षा के निमित्त होते है, अतः राज्यनवर्ग को भगवद्गीता की विद्या को समझना चाहिए, जिससे वह अपनी प्रजा पर कुशलता पूर्वक शासन कर सके और उन्हें (कामरूपी) भव बंधन से बचा सके।

 

 

 

 

सूर्य सभी लोको का राजा है, तथा सूर्यदेव (विवस्वान) सूर्य ग्रह पर शासन करता है जो ऊष्मा तथा प्रकाश प्रदान करके अन्य समस्त लोको को अपने नियंत्रण में रखता है। सूर्य कृष्ण के आदेश पर ही घूमता है और भगवान कृष्ण ने विवस्वान को भगवद्गीता की विद्या समझाने के लिए अपना पहला शिष्य बनाया था। अतः गीता किसी मामूली सांसारिक विद्यार्थी के लिए कोई काल्पनिक भाष्य नहीं है। अपितु ज्ञान का मानक ग्रंथ है, जो अनंत काल से चला आ रहा है।

 

 

 

 

मानव जीवन का उद्देश्य भगवान के साथ अपने शाश्वत संबंध के आध्यात्मिक ज्ञान का विकास है और सारे राज्यों और समस्त लोको के शासनाध्यक्ष को चाहिए कि शिक्षा संस्कृत तथा भक्ति द्वारा नागरिको को यह पढ़ाए। दूसरे शब्दों में सारे राज्य के शासनाध्यक्ष कृष्ण भावनामृत विद्या का प्रचार करने हेतु होते है, जिससे जनमानस इस महाविद्या के लाभ से परिपूर्ण हो सके और मनुष्य जीवन के अवसर का लाभ उठाते हुए अपना जीवन सफल बनाने की कोशिस करे।

 

 

 

7 Habits Of Highly Effective People Hindi Pdf
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इस मन्वन्तर में सूर्यदेव विवस्वान कहलाता है, यानी कि सूर्य का राजा, जो समस्त ग्रहो (लोको) का उद्गम है। ब्रह्मसंहिता में (5. 52) कहा गया है। ब्रह्माजी ने कहा – मैं उन श्री भगवान गोविन्द की पूजा करता हूँ, जो आदि पुरुष है और जिनके आदेश से समस्त लोको का राजा सूर्य प्रभूत शक्ति तथा ऊष्मा धारण करता है। यह सूर्य भगवान के नेत्र तुल्य है, और यह उनकी आज्ञानुसार ही अपनी कक्षा को तय करता है।

 

 

 

 

महाभारत में (शांति पर्व 348. 51-52) हमे गीता का इतिहास इस रूप में प्राप्त होता है

 

 

 

“त्रेता युग के आदि में विवस्वना ने परमेश्वर संबंधी इस विज्ञान का उपदेश मनु को दिया और मनुष्यो के जनक मनु ने इसे अपने पुत्र इक्ष्वाकु को दिया। इस पृथ्वी के शासक इक्ष्वाकु थे और उस रघुकुल के पूर्वज थे जिसमे राम भगवान ने अवतार लिया।” इससे यह प्रमाणित होता है कि महाराज इक्ष्वाकु के काल से ही भगवद्गीता विद्यमान थी।

 

 

 

 

चूंकि भगवद्गीता वेदो के ही समान है क्योंकि इसे श्री भगवान ने कहा था। अतः यह ज्ञान पौरुषेय है चूंकि वेदो के आदेशों के यथा रूप में बिना किसी मानवीय विवेचना के स्वीकार किया जाता है। फलस्वरूप गीता को भी सांसारिक विवेचना के बिना स्वीकार करना चाहिए।

 

 

 

 

इस समय कलयुग के केवल 5000 वर्ष व्यतीत हुए है, जबकि इसकी पूर्णायु ‘4,32,000’ वर्ष है। इसके पूर्व द्वापर युग 8,00,000 वर्ष था और इसके भी पूर्व त्रेता युग 12,00,000 वर्ष था। इस प्रकार से लगभग 20,05000 वर्ष पूर्व मनु ने अपने शिष्य तथा पुत्र इक्ष्वाकु से जो इस धरती के राजा थे श्रीमद्भागवत कही थी।

 

 

 

 

वर्तमान मनु की आयु लगभग 30,53,00,000 वर्ष अनुमानित की जाती है जिसमे से 12,04,00,000 वर्ष बीत चुके है। यह मानते हुए कि मनु के जन्म से पूर्व भगवान ने अपने शिष्य सूर्यदेव विवस्वान को गीता सुनाई, मोटा अनुमान यह है कि गीता कम से कम 12,04,00,000 वर्ष पहले कही गई, मानव समाज में यह 20 लाख वर्षो से रही। इसे भगवान ने द्वापर युग में 5000 वर्ष पूर्व अर्जुन से पुनः कहा। गीता के अनुसार ही भगवान कृष्ण के कथन के अनुसार यह गीता के इतिहास का मोटा अनुमान है।

 

 

 

 

सूर्यदेव विवस्वान को इसलिए गीता सुनाई गई क्योंकि वह क्षत्रिय था और उन सभी क्षत्रियो का जनक है जो सूर्यवंशी है।

 

 

 

संसारी तार्किक जन अपनी-अपनी विधि से गीता के विषय में चिंतन कर सकते है किन्तु यह यथारूप भगवद्गीता नहीं है। अतः भगवद्गीता को गुरु परम्परा से यथा रूप में ग्रहण करना चाहिए। यहां पर यह वर्णन हुआ है कि भगवान ने इसे सूर्यदेव से कहा, सूर्यदेव ने अपने पुत्र मनु से और मनु ने अपने पुत्र इक्ष्वाकु से कहा, इस तरह से गीता गुरु परंपरा के द्वारा आज तक विद्यमान है।

 

 

 

 

 

2- गुरु परंपरा से गीता-ज्ञान – इस प्रकार यह परम विज्ञान गुरु-परंपरा के द्वारा ही प्राप्त किया गया और राजर्षियों ने इसी विधि से इसे समझा। किन्तु काल खंड में यह परंपरा छिन्न होकर लुप्त हो गई, अतः यह विज्ञान यथा रूप में विलुप्त हो गया लगता है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – निश्चय ही भगवद्गीता कभी आसुरी पुरुषो के लिए नहीं थी। जिनसे किसी को भी इसका लाभ नहीं मिलता और वे अपनी-अपनी सनक के अनुसार इसकी विवेचना करते, गीता विशेष रूप से राजर्षियों के लिए थी क्योंकि वह इसका उपयोग प्रजा के उपर शासन करने में करते थे। अतः जैसे ही असाधु भाष्यकारो के निहित स्वार्थो से गीता का मूल उद्देश्य उछिन्न हुआ वैसे ही पुनः गुरु परंपरा स्थापित करने की आवश्यकता प्रतीत हुई, पांच हजार वर्ष पूर्व भगवान ने स्वयं देखा कि गुरु परंपरा टूट चुकी है। अतः उन्हें घोषित कर दिया कि गीता का उद्देश्य नष्ट हो चुका है।

 

 

 

 

भगवद्गीता यथा रूप मानवता के लिए महान वरदान है किन्तु इसे मानसिक चिंतन समझा जाय तो यह मूल्यवान समय का आपव्यय होगा। इसी प्रकार गीता के इस समय इतने संस्करण उपलब्ध है (विशेषतया अंग्रेजी में) कि उनमे से प्रायः सभी प्रामाणिक गुरु परंपरा के अनुसार नहीं है।

 

 

 

विभिन्न संसारी विद्वानों ने गीता की असंख्य टिकाए की है किन्तु वे प्रायः सभी श्री कृष्ण को स्वीकार नहीं करते, यद्यपि वे सब कृष्ण के नाम पर अच्छा व्यापार चलाते है। लेकिन यह आसुरी प्रवृत्ति है क्योंकि असुरगण कभी भी ईश्वर में विश्वास नहीं करते।

 

 

 

 

वह केवल परमेश्वर के गुणों का अवश्य ही लाभ उठाते है। अतएव अंग्रेजी में गीता के एक संस्करण की नितांत आवश्यकता थी जो परंपरा (गुरु-परंपरा) प्राप्त हो प्रस्तुत प्रयास इसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए किया गया है।

 

 

 

 

संयम से कर्म करना – जो व्यक्ति (ज्ञान के द्वारा) पूर्ण रूप से संयमित मन तथा बुद्धि से कार्य करता है, वह अपनी संपत्ति के सारे स्वामित्व को त्याग देता है और केवल शरीर निर्वाह के लिए कर्म करता है। इस तरह से कार्य करता हुआ वह पाप रूपी फलो से प्रभावित नहीं होता। ऐसा श्री कृष्ण कहते है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – कृष्ण भावना भावित व्यक्ति कर्म करते समय कभी भी शुभ या अशुभ फल की आशा नहीं करता है। उसके मन तथा बुद्धि पूर्णतया वश में होते है। वह जानता है कि वह परमेश्वर का भिन्न अंश है, अतः अंश रूप से उसके द्वारा संपन्न कोई भी कर्म उसका न होकर उसके माध्यम से परमेश्वर द्वारा संपन्न हुआ होता है।

 

 

 

अतः वह अपने प्रयासों के फलो के प्रति निश्चेष्ट रहता है। जब वह हाथ हिलाता है वह स्वेच्छा से नहीं हिलाता अपितु सारे शरीर की चेष्टा से हिलाता है। कृष्ण भावना भावित व्यक्ति भगवद इच्छा का अनुगामी होता है। यद्यपि उसकी निजी रूप से इन्द्रिय तृप्ति की कोई कामना नहीं रहती।

 

 

 

पशु के समान ही उसका अपने शरीर पर कोई अधिकार नहीं रहता। कभी-कभी क्रूर स्वामी अपने अधीन पशु को भी मार देता है तो भी पशु विरोध नहीं करता और न ही उसे कोई स्वाधीनता होती है। वह यंत्र के पुर्जे की भांति हिलता डुलता रहता है। जिस प्रकार रख-रखाव के लिए पुर्जे को तेल और सफाई की आवश्यकता पड़ती है उसी प्रकार कृष्ण भावना भावित व्यक्ति कर्म के द्वारा अपना निर्वाह करता रहता है। जिससे वह भगवान की दिव्य प्रेमाभक्ति करने के लिए ठीक बना रहे। अतः वह अपने प्रयासों के फलो के प्रति निश्चेष्ट रहता है।

 

 

 

आत्मसाक्षात्कार में पूर्ण रूप से तत्पर, कृष्ण भावना भावित व्यक्ति के पास इतना समय नहीं रहता कि वह अपने पास कोई भौतिक वस्तु रख सके। अपने जीवन निर्वाह के लिए उसे अनुचित साधनो द्वारा धन संग्रह करने की आवश्यकता नहीं रहती। अतः वह ऐसे भौतिक पापो के कल्मष से ग्रस्त नहीं होता है। वह अपने समस्त कर्म फलो से मुक्त रहता है।

 

 

 

 

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