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108 Upanishads Pdf / 108 उपनिषद Pdf Download

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नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको 108 Upanishads Pdf देने जा रहे हैं, आप नीचे की लिंक से 108 Upanishads Pdf Download कर सकते हैं और आप यहां से  यजुर्वेद इन हिंदी पीडीएफ Download कर सकते हैं।

 

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108 Upanishads Pdf / 108 उपनिषद पीडीएफ

 

 

 

पुस्तक का नाम 108 उपनिषद
पुस्तक के लेखक श्रीराम शर्मा आचार्य 
भाषा हिंदी 
फॉर्मेट Pdf
श्रेणी धार्मिक, उपनिषद 
पृष्ठ 556
साइज 37 Mb

 

 

 

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108 Upanishads Pdf
यजुर्वेद इन हिंदी पीडीएफ Download
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108 Upanishads Pdf
108 उपनिषद Pdf Download
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108 Upanishads Pdf
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108 Upanishads Name / 108 उपनिषद के नाम 

 

 

  1. अथर्वशिर उपनिषद्
  2. अध्यात्मोपनिषद्
  3. अवधूतोपनिषद्
  4. आत्मपूजोपनिषद्
  5. आत्मबोधोपनिषद्
  6. कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद्
  7. नारदपरिव्राजकोपनिषद्
  8. आत्मोपनिषद्
  9. आरुण्युपनिषद्
  10. आश्रमोपनिषद्
  11. कठरुद्रोपनिषद्
  12. कुण्डिकोपनिषद्
  13. कैवल्योपनिषद्
  14. क्षुरिकोपनिषद्
  15. जाबालदर्शनोपनिषद्
  16. जाबालोपनिषद्
  17. जाबाल्युपनिषद्
  18. तुरीयातीतोपनिषद्
  19. द्वयोपनिषद्
  20. निर्वाणोपनिषद्
  21. पंच ब्रह्मोपनिषद्
  22. परब्रह्मोपनिषद्
  23. परमहंस परिव्राजकोपनिषद्
  24. परमहंसोपनिषद्
  25. पैङ्गलोपनिषद्
  26. ब्रह्मबिन्दूपनिषद्
  27. ब्रह्मविद्योपनिषद्
  28. ब्रह्मोपनिषद्
  29. भिक्षुकोपनिषद्
  30. मण्डलब्राह्मणोपनिषद्
  31. महावाक्योपनिषद्
  32. मैत्रेय्युपनिषद्
  33. याज्ञवल्क्योपनिषद्
  34. योगतत्त्वोपनिषद्
  35. वज्रसूचिकोपनिषद्
  36. शाट्यायनीयोपनिषद्
  37. शाण्डिल्योपनिषद्
  38. शारीरकोपनिषद्
  39. संन्यासोपनिषद्
  40. सुबालोपनिषद्
  41. स्वसंवेद्योपनिषद्
  42. हंसोपनिषद्

ज्ञानखंड

  1. अमृतनादोपनिषद्
  2. ईशावास्योपनिषद्
  3. एकाक्षरोपनिषद्
  4. ऐतरेयोपनिषद्
  5. कठोपनिषद्
  6. केनोपनिषद्
  7. गायत्र्युपनिषद्
  8. छान्दोग्योपनिषद्
  9. तैत्तिरीयोपनिषद्
  10. नादबिन्दूपनिषद्
  11. निरालम्बोपनिषद्
  12. प्रणवोपनिषद्
  13. प्रश्नोपनिषद्
  14. बृहदारण्यकोपनिषद्
  15. मन्त्रिकोपनिषद्
  16. माण्डूक्योपनिषद्
  17. मुण्डकोपनिषद्
  18. मुद्गलोपनिषद्
  19. मैत्रायण्युपनिषद्
  20. शिवसंकल्पोपनिषद्
  21. शुकरहस्योपनिषद्
  22. श्वेताश्वतरोपनिषद्
  23. सर्वसारोपनिषद्
  24. स्कन्दोपनिषद्

साधनाखंड

  1. अक्षमालिकोपनिषद्
  2. अक्ष्युपनिषद्
  3. अद्वयतारकोपनिषद्
  4. कलिसंतरणोपनिषद्
  5. कालाग्निरुद्रोपनिषद्
  6. कृष्णोपनिषद्
  7. गणपत्युपनिषद्
  8. गरुडोपनिषद्
  9. गायत्री रहस्योपनिषद्
  10. गोपालपूर्वतापिन्युपनिषद्
  11. चतुर्वेदोपनिषद्
  12. चाक्षुषोपनिषद्
  13. तुलस्युपनिषद्
  14. त्रिपुरोपनिषद्
  15. त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद्
  16. दक्षिणामूर्युपनिषद्
  17. देव्युपनिषद्
  18. ध्यानबिन्दूपनिषद्
  19. नारायणोपनिषद्
  20. नीलरुद्रोपनिषद्
  21. नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषद्
  22. नृसिंहषट्चक्रोपनिषद्
  23. पाशुपत ब्राह्मणोपनिषद्
  24. प्राणाग्निहोत्रोपनिषद्
  25. बवृचोपनिषद्
  26. भावनोपनिषद्
  27. शरभोपनिषद्
  28. सरस्वती रहस्योपनिषद्
  29. महोपनिषद्
  30. योगकुण्डल्युपनिषद्
  31. योगचूडामण्युपनिषद्
  32. योगराजोपनिषद्
  33. राधोपनिषद्
  34. रामपूर्वतापिन्युपनिषद्
  35. रुद्रहृदयोपनिषद्
  36. रुद्राक्षजाबालोपनिषद्
  37. रुद्रोपनिषद्
  38. लागूलोपनिषद्
  39. सावित्र्युपनिषद्
  40. सीतोपनिषद्
  41. सूर्योपनिषद्
  42. सौभाग्यलक्ष्म्युपनिषद्

 

 

सिर्फ पढ़ने के लिए

 

 

 

जिसके विभीषण जैसे कायर मंत्री हो उसे जगत में विजय और विभूति कहां। दुष्ट रावण के वचन सुनकर दूत को क्रोध आ गया उसने मौका समझकर पत्रिका निकाली। और कहा – श्री राम जी के छोटे भाई ने यह पत्रिका दी है। हे नाथ! इसे किसी से पढ़वाकर अपनी छाती शीतल कर लीजिए।

 

 

 

 

56- दोहा का अर्थ-

 

 

 

पत्रिका में लिखा था अरे मुर्ख! केवल बातो से ही रिझाकर अपने कुल को नष्ट न कर। श्री राम जी से विरोध करके तू विष्णु, ब्रह्मा और महेश्वर की शरण में जाने पर भी नहीं बचेगा।

 

 

 

 

या तो अभिमान छोड़कर अपने छोटे भाई विभीषण की भांति प्रभु के चरण कमल का भ्रमर बन जा अथवा श्री राम जी की त्रास से परिवार सहित समाप्त हो जा दोनों में से जो अच्छा लगे सो कर।

 

 

 

 

चौपाई का अर्थ-

 

 

 

पत्रिका सुनते ही रावण मन में भयभीत हो गया परन्तु ऊपर से मुसकराता हुआ सबको सुनाकर कहने लगा – जैसे कोई पृथ्वी पर बड़ा रहकर हाथ से आकाश पकड़ने की चेष्टा करता हो वैसे ही छोटा तपस्वी वाग्विलास करता है।

 

 

 

 

शुक ने कहा – हे नाथ! अभिमानी स्वभाव को छोड़कर इस पत्र में लिखी सब बातो को सत्य समझिए। क्रोध छोड़कर मेरा वचन सुनिए। हे नाथ! श्री राम जी से वैर त्याग दीजिए।

 

 

 

 

यद्यपि श्री रघुवीर जी समस्त लोक के स्वामी है। पर उनका स्वभाव अत्यंत ही कोमल है। मिलते ही प्रभु आप पर कृपा करेंगे और एक भी आपका अपराध अपने हृदय में नहीं रखेंगे।

 

 

 

 

जानकी जी रघुनाथ जी को सौप दीजिए। हे प्रभु! मेरा इतना कहा कीजिए। जब उस दूत ने जानकी जी को देने के लिए कहा तब उस दुष्ट रावण ने उसे भगा दिया।

 

 

 

 

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